Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
तरङ्गवलया लोलसीकरोत्करहारिणी ।
कुमुदोत्पलकह्लारपुष्पसंभारसुन्दरी ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
इस पर्वतीय
ग्राम के झुण्डों के बीच मेँ तुरन्त खिली हुई कलियों की पँखुड़ियों के अन्दर छिप-छिपे गुंजन कर रहे
मदोन्मत्त भँवरों के दर्शन से कामोद्रेकवाले, पर्वतगुफा में रहनेवाले पामर लोगों को जो आनन्द प्राप्त
होता है, वह श्रेष्ठ आनन्द नन्दनवन में विहार करनेवाले देवताओं को भी सुलभ नहीं है, ऐसा मेरा
विश्वास है