Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
पुत्रस्येह दलोदरे द्युति तरत्तारं चिरं संस्मृतं हंसस्यांसविनुन्ननालगहने संचारिणा भो मया ।
शुक्लासारमिवाब्जिनी विकिरति स्वं वारिबिन्दूत्करं मध्याह्ने शिशिरं विकासि सहसा मूर्घ्नि स्फुटं दृश्यताम् ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
एक बगल
में चल रहा चन्द्रमण्डल ही जिनका आभूषण है, जल से भरे मेघरूपी हाथी जिनमें आराम करते हैं
ऐसे पर्वतशिखरों पर बसे हुए इन ग्रामां में जो अतिशय सौन्दर्य है, वह अतिशय सौन्दर्य वैभवपूर्ण
ब्रह्मा के राज्य में कहाँ सुलभ है ?