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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

व्योम्नीन्दोरिवसौम्यवारिणिचिरं निःशब्दकं सर्पतो हंसस्यांसहताब्जनालवलनानिष्कम्पटङ्कक्षतैः । गङ्गावारिवदत्र पुष्करपुटाद्ब्राह्मादिवास्योपरि भ्रष्टा ये जलबिन्दवो जलचरा हृष्टाः पिबन्त्याशु तान् ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

अपनी मनोहारिणी सुगन्धि से नन्दनवन के केन्द्र की तरह सुन्दर कल्पवृक्ष के फूलों के गुच्छों का परिहास करनेवाली निकुंजों से भरी हुई पर्वत कंदराओं में, जो पुष्पित होने के कारण गंभीर गुंजन करनेवाले भँवरों से व्याप्त नीम के पेड़ों से पटी है, मुझे बड़ा आनन्द मिलता है