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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 46

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 46

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

हरिणियों के निनाद से रमणीय, मनोहर हारीत पक्षियों से सुन्दर पर्वत-ग्रामों में काम के नगरों में जैसी लोगों की प्रीति है