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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 53

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 53

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अहा ! मेघ ने जल बरसाया, अहा ! जल से पृथिवी आप्लावित हो गई, अहा ! जैसे धनाढ्य पुरुष अपने दीन-हीन मित्र को धन-दौलत से पुष्ट करते हैं वैसे ही जलों ने भूमि में मुरञ्चाये हुए धान आदि को पुष्ट किया है