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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 54

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 54

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

को पारश्ववर दया, उदारता आदि गूर्ण के वर्णन के किलमिले में उनसे विपरित निर्वयता, अनुदारता आरि ददुरण से युक्त मूर्खो की, कृत्ते के गुणो से अदला बदली के सन्देह प्रवर्थन द्वारा, निन्दा करता है/ निर्दयता, अस्थिरता,अशुद्धता, गलियों में मारे मारे फिरना, सर्वथा निन्यता आदि दुर्गुण कुत्तों से मूर्खो ने सीखे या मूर्खो से ही कुत्ते ने लिये इसका मुझे सन्देह है, निश्चय नहीं है