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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 61

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 61

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

कुत्ता सदा अपवित्र वस्तु खाता है, अति अपवित्र विष्ठा के ढेर में ही खेलता है, बेचारे जीवित नेउर, चूहे आदि को भाग्यवश पाकर बड़े चाव से खा डालता है, निर्बल बकरी, बछड़े आदि को बिना किसी अपराध के काट खाता है, कुतिया के साथ सटने पर सब लोग उसे मारते हैं । सचमुच ब्रह्मा ने अत्यन्त असमर्थ कुत्ते को लोक में जन्मभर दुःख भोगने के लिए ही रचा है