Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 65
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हिन्दी अर्थ
विविध वनपुष्पों के केसर से
धवल देहवाले कौए को लोगों ने हंस समझा । बाद में जब उसे सड़े-पड़े कीड़े मकोड़े निगलते देखा
तब जाना कि यह कौआ है