Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 71
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 71 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 71
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हिन्दी अर्थ
कमलवन में विविध क्रीडाएँ कर रहे कलंकसदृश कौए को जोर जोर से काँव-काँव कटुशब्दों के
श्रवण से दुःखवश भौचक्का होकर जो नहीं रोता उस आदमी को आरे के तुल्य कट् वचनों से तुम्हें
चीर डालना चाहिये, मैं तो वैसा नहीं हूँ, अतः क्योकर मेरे सामने काँव-काँव करते हो ?