Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 72
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 72 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 72
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हिन्दी अर्थ
खलो की सभा मेखल ही योग्य हैं । वहाँ फर एक भी साधु का रहना ठीक नहीं है, यों अन्योक्ति
द्वारा कोई कहता है /
इधर-उधर घूम रहे हिंसक जलजीवों से पूर्ण बगुले, जलकाक आदि से पटे हुए छोटे से
कीचड़मय तालाब में यदि चंचल उल्लू और कौए रहें, तो यह तालाब की सभा अपने योग्य सदस्यों
से सम्पन्न हो