Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 77
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 77 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 77
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हिन्दी अर्थ
अयोग्य श्रोताओं के बीच अनवर में अयोग्यों को योग्य समझकर श्रान्त से अपने गुणों का
प्रदर्शन करने के लिए उत्सुक किसीके प्रति कड दसय अन्योक्ति से कहता है /
हे कोयल, तुम श्रोताओं की योग्यता आदि का विचार किये बिना ही अपने गुणों के प्रख्यापन
की उत्सुकता से उत्पन्न हर्ष से जल्दी-जल्दी क्यों कूकते हो ? गलेरूपी कोटर से हर्षवश हो रहे
कुहकने के उल्लास को अपने अन्दर प्रवेश करा दो, मौन हो जाओ | यह गुणों के प्रख्यापन का
अवसर है और ये श्रोता की योग्यता रखते हैं ऐसी भ्रान्ति तुम्हें न होनी चाहिये । यह फूलों की बहार
से पटा हुआ वसन्तऋतु का उन्मेष नहीं है, किन्तु हेमन्त ने इन पेड़ों को पाले की वषसि सुखा डाला
है । इनके बीच तुम्हारी वाणी सफल न होगी