Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 118, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
इह सरोवरतीरतरोस्तले कुसुमशालिनि मुग्धमृगान्पुरः ।
समवलोकय लोकमलौ बलात्समवकीर्णनवोत्पलकेतकान् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अपने ही जल से बहाये जा रहे
तथा चक्राकार भँवर बनानेवाले जलाशयो के कल्लोलों की परम्परा बड़ा आश्चर्य पैदा करती
है वैसे ही अपने अज्ञान से ही संसार के प्रवाह में बहाये जा रहे सत्असत्कर्मरूप भँवरों की
रचना करनेवाले जड़ लोगों के मनोरथो की परम्पराएँ आश्चर्य में डालती हैं