Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 118, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
बर्ही प्रोन्नतचित्तत्वात्तोयमिन्द्रं प्रयाचते ।
स पूरयति तेनास्य महात्मा निखिलां महीम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
जेते कुजे बावड़ी, तालाब और सागरर आदिरुप उपाधि के भेद से जल में तारतस्य की
त्कर्ष-अपकर्ष की) प्रतीति होती हैं. वैसे नारी, पुरुष आदि के शरीर के उत्कर्ष स्रे उनकी आत्मा
में उत्कर्ष और अपकर्ष के तारतस्य की प्रतीति होती है, ऐसा कहते हैं /
कुआँ, बावड़ी सरोवर और सागर के जल में उपाधि भेद से जैसा अन्तर दृष्टिगोचर होता है
वैसा ही अन्तर नारी, पुरुष, बालक आदि के शरीर के (उपाधि के) उत्कर्ष से उनकी आत्मा में भी
उत्कर्ष ओर अपकर्ष का तारतम्य समझना चाहिए