Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 118, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
इहातिवाहयन्त्येते मार्गदौस्थ्यं घनागमे ।
कथाभिः पथिकाः प्रायो विमूढा जीवितं यथा ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
जो भ्रमर शरदादि ऋतुओं में चन्द्रमा के
कोटर के तुल्य कोमल (सुन्दरतम) कमलों के अन्दर रहा, खेला, सोया और गूँजा, हाँ खेद है, वही
यह बेचारा भ्रमर शिशिर ऋतु के आने पर अन्य नीरस वृक्षों से कैसे प्रीति करेगा ?