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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 118, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

भृङ्गावलीकुवलयावलिताब्जपात्रसंप्रेर्यमाणनलिनीमधुपानमत्तः । हा वाति तीरतरुपल्लवलास्यलब्धसंमुग्धशब्दगणगीतगुणो नभस्वान् ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

कोई पार्श्वचर हँस्श्रेणी का वर्णन करता हुआ उसे राजा को दिखलाता है / राजन्‌, देखिये, सरोवरों की नाभिरूप नलिनियों के उपयुक्त केसरों से उनके समान कान्तिवाले शोभा से पालित यह हंसश्रेणिरूपी सुन्दर लता है, इसकी ध्वनि सामगायन के समान गंभीर है