Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 118, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 45
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हिन्दी अर्थ
हे राजन्, इस सरोवर में, आकाश में चन्द्रमा की तरह प्रसन्न
(स्वच्छ) जल में चुपचाप चिरकाल तक तैर रहे हंस के पंखों से प्रताडित कमलनालों के संवलनरूप
निष्कम्प टंकाघातों से ब्रह्म के आसनभूत कमलपुट के समान कमलपुट से जो जलबिन्दु इसके
ऊपर गिरे, उन्हें मछली आदि जलचर बड़ी प्रसन्नता से गंगाजल के तुल्य शीघ्र पीते हैँ