Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 119, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 119, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
सहचरा ऊचुः ।
कथयत्येष पथिकः पश्य मन्दरगुल्मके ।
प्रियायाश्चिरलब्धाया वृत्तां विरहसंकथाम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
सहचर और सहचरियों ने क्रम से कहा : देखिये, यह बक यद्यपि प्रायः निर्गुण है तथापि इसमें
एक गुण है, वह यह कि प्रावृट् -प्रावृट् कहता हुआ यह पावृट् का (वर्षा ऋतु का) स्मरण कराता है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ सत्रहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ अठारहवाँ सर्म बगुले, जलकाक, मोर, वियोगीपथिक मछली ओर चातकों के चरित्र का वर्णन।