Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 119, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 119, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
तत्राहं तैः कमलवदने बाष्पपूर्णाक्षिपक्षैर्न्यस्तः कैश्चिच्चितिशयनके बद्धलोकालिलेखे ।
धूमोद्गाराविरलजटिले मस्तके मत्तमृत्योश्चूडारत्नोत्तम इव कलामात्रदृश्येऽग्निहेम्नि ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
बगुला, जलकाक ओर दूसरों पर घात करनेवाले
मछुए आदि नित्य एक ही जगह रहते हैं, फिर भी मूर्ख और विद्वानों की बुद्धि के समान इनकी बुद्धि
का आपस में मेल नहीं है