Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 119, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 119, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
त्वत्संकल्पामृतकवचितो नापविद्धस्तयाहं कुन्तश्रेण्या दृढपतनया वज्रकायो यथाजः ।
त्वामासन्नां मदनसरितं हृद्गृहे गाहमानो मर्मच्छेदेष्वपि विलसिता नाविदं वेदनास्ताः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
छोटी
तलैया के तट के वृक्ष पर उल्लास के साथ वह चपल बगुला जब जोर से बोलता है तब थोड़े से जल
से गीले तलैयारूपी गोखुर मे पूर्णशक्् से प्रेम से प्रियतम की छाती में जैसे भय से चिपट रही विचारी
मछली ने मरकर भी अपने शरीर की रक्षा की । इस संसार में महा आपत्ति प्राप्त होने पर हृदय फटने
से हुई मृत्यु से बढ़कर दूसरा सुखपद शरण नहीं है । मरकर भी जो उसने अपने शरीर की रक्षा की,
वह भी उचित ही किया