Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 119, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 119, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
हा हा हुताश इति किंचिदिवोपजातखेदो वदामि खलु यावदहं त्वरावान् ।
तावच्चितिर्झटिति तैरवलुण्ठिता सा पान्थैः क्षणात्खरखराकुलिता लसद्भिः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
मोर सनो के हृदय के समान स्वच्छ महान् सरोवर को छोड़कर मेघ द्वारा
थूका हुआ जल पीता है, मालूम पड़ता है उसका मेघ का जलपान सरोवर को नमस्कार करना पड़ेगा,
इस भय से है