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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 119, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 119, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

पार्श्वच्छायां हरन्तो विचलितविदलत्क्लिन्नकङ्कालगन्धास्तन्वन्तो भूरिभस्मप्रविततमिहिकामाधुनानाः शवानाम् । केशानाकाशकोशे शशिगलितशराकारिणः शांकराणामस्थीनां टांकृतेनारचितखरगिरस्तत्र वाता वहन्ति ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

हे चकित चातक, तुम्हारा वनभूमि में गर्मी के दिन अग्नि से दुषित (सदा अग्नि की संभावनावाले) सूखे पेड के खोखले में निवासके आग्रह से सूचित अति अभिमानिता सुख के लिए नहीं है । तुम केले के वन के समीपवर्ती शीतल हरे तिनको को चरो, नहर आदि मेँ जल पीओ एवं केले के वन में विश्राम लो