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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 12, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

भुशुण्ड उवाच । ख एव व्योम संपन्नमिति संकल्पनं यथा । भ्रान्तिमात्रमसद्रूपं तथाहंभावभावनम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

अविद्या ही अहंभावरुपी खुक्ष्मप्रपंचभाव है / उसी की स्थूलरूपता होती है / इस रीति से समस्त विकल्पों के चिति का विवर्तमात्ररूप होने से स्वरे एकता दिखलाते है/ भुशुण्डजी ने कहा : हे विद्याधर, आकाश में ही दूसरा आकाश उत्पन्न हुआ यों अपने मन से एक दूसरे आकाश की कल्पना कर लेना ही जैसे एक ही आकाश में भेद की भ्रान्ति है, वैसे ही अज्ञात आत्मा में सूक्ष्मप्रपंचात्मक सद्रूप अहंभाव की कल्पना करना एकमात्र भ्रान्ति है

सर्ग सन्दर्भ

ग्यारहवाँ सर्ग समाप्त बारहवाँ सर्ग अहंभाव भ्रान्तिमात्र है, जगत्‌ का भ्रम चिति का विवर्त है, उसकी मूल अविद्या है तथा अविद्या के नाश का क्रम क्या है-इन सबका वर्णन ।