Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 11, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 11, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
न केनचित्कस्यचिदेव कश्चिद्दोषो न चैवेह गुणः कदाचित् ।
सुखेन दुःखेन भवाभवेन न चास्ति भोक्ता न च कर्तृता च ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
उम्र स्थिति में सम्पूर्ण गुण, दोष आदि के विक्षेपों के हेतुओं की शान्ति रहती है, यह कहते है/
उस ज्ञानरूप अवस्था में सम्पत्ति या विपत्ति तथा उससे उत्पन्न सुख या दुःख किसी कारण से
भी इस संसार में किसी को कभी भी कोई गुण या दोष उत्पन्न नहीं होता, क्योकि उस दशा में
कर्तृता के न रहने से भोक्तृता भी नहीं रहती (00)