Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 11, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 11, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
जगत्पदार्थसार्थौघमनोबुद्ध्यादि संस्थितम् ।
ज्ञ एवासंविदंस्तिष्ठ परिनिष्ठितनिष्ठया ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर हे विद्याधर, सर्वसाक्षिस्वरूप होकर तुम बाह्य जगत्
के सम्पूर्णं पदार्थो तथा आन्तरिक मन, बुद्धि आदि का अनुभव न करते हुए अपनी स्वाभाविक
स्थिति से बैठे रहो