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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 12, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

प्रसरणाप्रसरणे न च संभवतो विदः । खादप्यत्यन्तस्वच्छत्वादक्षोभादेः सदैव हि ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

विति का जगत्‌ के आकार में परिणामस्वरूप वास्तविक प्रसार क्यो नहीं है, इस पर कहते हैं। आकाश से भी अत्यन्त अधिक स्वच्छ होने तथा संचलन आदि सब तरह विकारों से शून्य होने से चिति का विस्तार और संकोच वास्तव में नहीं होता (अतएव उ संचार की उत्पत्ति और नाश एकमात्र ज्ञान से ही सिद्ध है)