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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 12, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

आधिमान्यः स्फुरत्येवं परे स्फुरति भासुरम् । जगदाद्यात्मकं चित्तं चक्रौघत्वमिवाम्भसि ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह भगवान्‌ परमेश्वर के अपने से अभिन्न जगत्‌ के आकार में सर्वसाधारण सच्चिदानन्दात्मरूप ने खूब चमकते हुए स्फुरित होने पर देह आदि किसी एक स्थान में विशेष अभिमान करके उसके अनुकूल या प्रतिकूल हेय या उपादेय कल्पना द्वारा अहंकारात्मा ही अन्य की नाई स्फुरित होता है । इस तरह जल में आवर्तसमूह की नाई यह सम्पूर्णं जगत्‌, जीव, बन्ध मोक्ष आदि की कल्पना जो कि एकमात्र भ्रान्त चित्त ही है, अणुमात्र भी ओर कुछ नहीं है