Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 12, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
मज्जनोन्मज्जनारावैर्विवर्तावर्तवेष्टनैः ।
अच्छिन्नानुपदं क्षीणा भाति सर्गसरिच्चिरम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
दष्टान्त और काष्टान्तिक इन दोनों का रूपक द्वारा एकीकरण करके उपपादन करते हैं /
मज्जन और उन्मज्जन के शब्दों से तथा विवर्तावर्तरूपी भ्रमणों से पूर्ण बराबर बह रही यह
सृष्टिरूपी मृगजल की नदी स्फुरित हो रही है, जो कि तत्त्वसाक्षात्कार से शीघ्र ही चिरकाल के
लिए क्षीण हो जाती है । तात्पर्य यह है कि जैसे मृगतृष्णा की नदी मरुभूमि के साक्षात्कार से शीघ्र
नष्ट हो जाती है वैसे ही यह सृष्टि भी परमात्मतत्त्व के साक्षात्कार से शीघ्र ही सदा के लिए क्षीण
हो जाती है