Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 12, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
यथावर्तैः पयो भाति धूमो भाति यथा घनः ।
तथा जडात्मकतया तृतीयः सर्ग एतयोः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे आवर्तों से जल या दूर से धूमसमूह निबिड़ मेघरूप से भासता है वैसे ही
ब्रह्म और मन इन दोनों के मध्य में तीसरी यह सृष्टि विषयरूप होने से जड़ और सत्यरूप से
स्फुरित होने के कारण अजड़रूप से भासती है