Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 12, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
दारुणि क्रकचच्छेदे यथावर्तादिकं तथा ।
अदिगादौ परे सर्गस्तदतद्रूपवानयम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
आरी से लकड़ी चीरने पर जैसे आवर्त आदि
भासते हैं वैसे ही देश-कालादि से शून्य परमात्मा में यह सृष्टि जड़ और अजड़रूप से भासती
हे