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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verses 19–22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 12, verses 19–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 19-22

संस्कृत श्लोक

सहस्रखुरमूर्धाक्षिकरवक्त्रहितोहितम् । नानाद्रितनुदिग्देशसरित्प्रादेशमात्रकम् ॥ १९ ॥ अन्तःशून्यमसारात्म बहुरागोपरञ्जितम् । स्फुरद्विरागविहितमार्जनामात्रतर्जनम् ॥ २० ॥ ससुरासुरगन्धर्वविद्याधरमहोरगम् । जडात्मपवनस्पन्दि परचेतनचेतितम् ॥ २१ ॥ पटे चित्रमहाराज्यमिव भासुरसुन्दरम् । परामर्शासहं चारु विकल्पस्फूर्जितं जगत् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

पट के ऊपर विरवित चित्रगत राज्य के स्ाद्भश्य से अव इस जगत्‌ का वर्णन करते हैं / हे विद्याधर, यह रमणीय सारा संसार पट के ऊपर विरचित चित्रगत महाराज्य के सदुश्य प्रकाशयुक्त, सुन्दर और विकल्प से विस्फूर्जित है । हे विद्याधर, चित्रगत महाराज्य के सदृश ही यह भी परामर्श को न सहनेवाला (४) है । इसके अन्दर हजारों पैर, मस्तक, नेत्र, हस्त, (४) परामर्श यानी विचार, इसको नहीं सहनेवाला यह संसार है अर्थात्‌ विचार करनेपर तनिक भी मुख तथा इनसे इच्छित और वितर्कित वस्तुएँ एवं नाना प्रकार के पर्वत, चतुर्विध प्राणियों के शरीर, दिशाएँ ओर अनेक नदियाँ परमात्मा के माप से प्रदेशमात्र के समान परिच्छिन्न हें । अनेक प्रकार के रंजक द्रव्यो से रंजित चित्रगत महाराज्य की नाई यह सारा संसार भी अनेक प्रकारके कामादि रूप रंगों से रंजित है । विरुद्ध वर्णवाले मार्जनद्रव्य से परिमार्जन कर देना ही एकमात्र जिसका नाश है ऐसे चित्रलिखित महाराज्य की नाई यह सारा संसार भी केवल तीव्र वैराग्यमात्र से ही परिमार्जित होता है । हे विद्याधर, सुर, असुर, गन्धर्व, विद्याधर तथा बड़े नाग आदि से युक्त जड़ात्मक पवन स्पन्दनशील तथा द्रष्टाचेतन से चेतित चित्रलिखित महाराज्य की नाई यह सारा संसार भी सुर, असुर, गन्धर्व आदि से युक्त सूत्रात्मा से स्पन्दनशील तथा ब्रह्मचेतन से चेतित है