Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 12, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
स्पन्दात्मनि विकल्पांशे पतिताऽसत्यरूपिणि ।
संवित्प्रसरति भ्रान्तौ तैलबिन्दुरिवाम्भसि ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
अर्थशून्य तथा बाध्य होने से असत्यस्वरूप स्पन्दनात्मक
विकल्पांश में यानी विकल्पात्मक वृत्ति जिसमें उदित होती है ऐसे मन में प्रतिबिम्बभाव से पतित
संवित् भ्रान्ति में एसे प्रसरणशील होती है, जैसे जल में तैलबिन्दु