Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 12, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
चिदादित्यः स्व आत्मैव सर्ग इत्यभिधीयते ।
भूत्वाहमिति तेनान्यो न सर्गोऽस्ति न सर्जकः ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
उपाधि के अनुप्रवेश द्वारा नाम और रूपों का व्याकरण करनेवाले अहमर्थ जीव के बह्ममात्र
होने से जीव का भोग्य स्र्यशब्दार्थ भी एकमात्र ब्रह्म ही है, यह कहते हैं ।
यह चिद्रूपी सूर्य स्वात्मा ही है। यह उपाधि में प्रवेश द्वारा "अहम्" इत्यादि नाम को प्राप्त होकर
"सर्ग" इस नाम से कहा जाता है । इसलिए यह सिद्ध है कि वास्तव में चेतन से अन्य न कोई सृष्टि
है और न कोई इस सृष्टि का रचयिता ही है