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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 12, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

स्पन्दात्मिकायां सत्तायां यथा स्पन्दो जलद्रवः । तथा चिदात्मा व्योमत्वेनव्योमत्वादि वेत्ति हि ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

राहु का भिर" यहाँ पर जैसे राहु और उसके भिर में अभेद चिद्ध है यानी जो राहु हैं वही तो उसका सिर हैं, इसी तरह जयत्‌ और चित्‌ में अभेद सिद्ध हैं / इन दोनों में एकमात्र अविद्याके कारण ही भेद की प्रतीति हो रही है / इसका प्ष्टान्त देकर उपपादन करते हैं / जैसे स्पन्दरूप अपनी सत्ता में वस्तुतः जलद्रव स्पन्दरहित ही है उसमें स्पन्द की प्रतीति तो टीक नहीं सकता तथा चित्र भी दूसरे द्वारा हुए उपमर्दन को नहीं सह सकता । एकमात्र विकल्प ही है, (७) वैसे ही आकाशादि प्रपंच की रचना में चिदात्मा न आकाशादिरूप से स्थित है, न इन सबका कर्ता हे ओर न आकाशादि पदार्थों को अपने से भिन्न समझता ही है