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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 12, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

चतुर्भागात्मनि कृते इत्यविद्याक्षये क्रमात् । समकालाच्च यच्छिष्टं तदनामार्थसन्मयम् ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त रीति से भूमिकाओं के अभ्यास द्वारा समकाल में और क्रमश: चार भागों मेँ विभक्त अविद्या के नष्ट कर दिये जाने पर जो अवशिष्ट रहता है वह नामरूपरहित सन्मात्र ही परमपुरुषार्थ है