Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 12, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
घनस्ततोऽचिदाभासः खादप्यतितरामणुः ।
जानाति यत्स्वभावं तदेतत्सर्गतया स्थितम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
उस ब्रह्म की परम सृक्ष्मरुपता का उपपादन करते हैं /
आकाश से भी अत्यन्तसूक्ष्म अज्ञानरूपी अनादि विवर्तं है, जो कि आत्मचिति अत्यन्त
स्थूल है उस तरह का परमसूक्ष्म चेतन ही भै, यह" इत्यादिरूप अनादि वासना से उत्तरोत्तर
स्थूल हुए अपने स्वभाव की कल्पना करके जो सब पदार्थो को जानता है वही यह सब सृष्टिरूप
से स्थित है