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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 120, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

विलोलमञ्जरीजालतडित्सङ्गस्थितोऽसितः । चातकस्याम्बुदभ्रान्तिं तमालः कुरुते मुधा ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

हे प्रिये, मँ तुम्हारे आकाररूप अमृत से कवचावृत था, अतएव कवचावृत मुझको उक्त धूम्रपंक्ति ने वैसे ही पीड़ा नहीं पहुँचाई जैसे कि वजांग ब्रह्माजी को जोर से छोड़ी गयी मृत्यु के भालों की श्रेणी ने पीडित नहीं किया ओर हृदयरूपी गृहसमीपवर्तिनी कामनदीरूप तुम में गोते लगा रहे मुझको अभिदाह से भी मर्मच्छेद होने पर उत्पन्न हुई पीड़ा मालूम न होती केवल धुएँ से तो क्योंकर पीडा होती ?