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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, Verses 10–11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 120, verses 10–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 10,11

संस्कृत श्लोक

राग एव हि शोभायै निर्गुणानां जडात्मनाम् । राजेव राजते राजन्रागेणैवैष किंशुकः ॥ १० ॥ आगच्छ कर्णिकारोऽयं विकारस्यैव भाजनम् । निरामोदः किमेतेन निर्गुणेनेव जन्तुना ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

हे कमलाक्षि, वहाँ पर अश्रुपूर्ण नेत्रराजिवाले कु पथिको ने मुझे चितारूपी शय्यापर रक्खा । वहाँ पर चारों ओर लोकपंक्तियों की तरह जिसकी पंक्ति बँधी थी, धूम्रराशि के उद्गार से निरन्तर जटायुक्त (व्याप्त), मदोन्मत्त मृत्यु के मस्तक पर उत्तम चूडामणि के सदुश प्रकाशमान अभिरूप सोने के थोडी-बहुत दृश्य होने पर नीलकमललता के समान कोमल, गरम, काली दीर्घता के संकोच से कुबडी, धूम्रपंक्ति कोमल गले के सूराख और नासिकारन्ध्र में, नेवले से भयभीत हुई बालसर्पिणी छोटे भूमि के छेद में जैसे प्रवेश करती है वैसे ही प्रवेश करने के लिए प्रवृत्त हुई