Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 120, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
हेमसान्वासनस्थोऽग्र्यो वातव्याधितटोऽम्बुदः ।
तडित्पीताम्बरं धत्ते क्षुब्धं हरिरिवोद्भवः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे
प्रिये, तुम्हारी वह केवल स्वानुभव से ज्ञेय निरतिशयानन्दरूप अनुपम लीला, वैसे ही भौंह मटकाना
आदिरूप विलास, वैसा ही आनन्दमय वचन, वैसा ही मुस्काना, वैसे ही कटाक्ष तथा वही प्रधान
अलंकाररूप मणिमयी एकावली रहित आभ्यन्तरिक आनन्द के उचित आलिंगन, वैसी ही नखक्षत
आदि चेष्टाएँ, वैसा ही रतिकूजित, वैसे ही हँसना, चलना चित्तविक्षोभ आदि थे । इनमें से जिसका
स्मरण हृदय में अमृत रसाह्नाद न करे ऐसा कोई न था सभी हृदय में आह्लाद पैदा करते ही थे