Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 120, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
प्रवेशनिर्गमव्यग्रतरत्खगशिलीमुखः ।
प्रफुल्लकिंशुको भाति वीरो रक्त इवासृजा ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुग्धे, उसके पश्चात् मैं तुम्हारे संगम से अतितृप्त होने के कारण थकने से शिथिल होकर वहाँ पर
कोमल शय्या पर लेट गया, जो शरत् ऋतु में शीतल किरणों से युक्त चन्द्रबिम्ब जैसी स्वच्छ थी