Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 120, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
मन्दारमञ्जरीपुञ्जपिञ्जराम्भोदमन्दिरे ।
महेन्द्रमस्तके मत्ताः सुप्ता गन्धर्वकामिनः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
इस बीच में एकाएक मैंने जैसे चन्दनपंक के सदुश शीतल विशाल चन्द्रबिम्ब से मेघनिघोषि के साथ
वज निकले वैसे ही अत्यन्त असंभावनीय अपनी शय्या से निकली अपनी देह से स्पृष्ट शब्दयुक्त
चिता के नीचे जली हुई अभि को क्षीरसागर के बड़वानल के समान देखा