Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 120, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
कल्पद्रुमवनच्छाया विश्रान्ता विततान्विताः ।
पश्य पार्थिव गायन्ति सिद्धविद्याधराध्वगाः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
सहचरो ने कहा :
राजन्, उक्त प्रिय के ऐसा कहने पर कहा “भे मरी" कहती हुई वह मुग्धा नायिका मुग्धतावश महान्
प्रलय की आशंका से मूर्छित हो गयी