Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 120, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
अन्योन्यामतसिंहेभनकुलोरगकेलिकाम् ।
पश्य मुन्याश्रमश्रेणिं सर्वर्तुकुसुमद्रुमाम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्रिये, मुञ्चे जब आग की लपटों से कुछ पीड़ा हुई
तो ज्योंही मैंने घबराहट के साथ “अरे अरे आग" कहा त्योंही झटपट आनन्द में मग्न हो रहे पथिको
ने खड़खड़ (चटचट) शब्द से व्याप्त वह चिता सब लाठियों को हटाकर क्षणभर में शान्त कर दी