Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 120, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
कुलाचलगुहागेहवलनोद्यन्मृगाधिपाः ।
सरन्त्यसुरसंरम्भैर्लवणार्णवमारुताः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
हाँ याद आई, सामने पर्वत शिखर पर यह दिखाई दे रहा मेघ प्रेम से सदा परदुःख को
निवृत्त करना आदि गुणों से युक्त है यह कामदेव के घोड़े के समान शीघ्र मेरे घर जा सकता है ।
परोपकार में परायण यह बिजली की रेखारूप विलासवती नायिका से वेष्टित हो स्थित हे