Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 121, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 121, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 121 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
इति संचिन्त्य ते सर्वे यथास्थानमवस्थिताः ।
सममेवाह्वयामासुर्भगवन्तं हुताशनम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
उदारता आदि गुणों से रहित मूर्खो की वस्त्र, अलंकार आदि
के आडम्बर से शरीर की सजावट ही शोभा के लिए होती है, अन्य कुछ नहीं । राजन्, यह फूला हुआ
पलाश का पेड़ फूलों की सजावट से ही राजा के तुल्य मालूम पड़ता है