Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 121, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 121, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 121 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अग्निर्जगामाथ समाजगाम निशा विलम्ब्याथ जगाम सापि ।
समाजगामापि रविर्जगाम तेषां च धीरार्णवलङ्घनेहा ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राजन् देखिये,
कल्पवृक्षो के वन की शीतल छाया में विश्राम कर रहे, उत्तम वीणा आदि बाजों से युक्त ये सिद्ध और
विद्याधर गाते हैं