Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 121, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 121, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 121 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथैवमस्त्विति प्रोच्य पावकः सहसागमत् ।
क्षणादौर्वतया यातुं समुद्र इव सत्वरः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
महेनद्रपर्वत के शिखर पर मन्दारमंजरियों की राशियों की राशियों
से पीले मेघरूपी मन्दिर में ये कामी गन्धर्व मद्यपान से मत्त होकर सोये हैं