Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 121, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 121, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 121 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
आसिद्धगम्यमध्वानं मृत्युरस्माकमस्तु मा ।
अध्वन्यसंभवद्देहे मन एव प्रयातु नः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रवेश और निर्गम में उतावलीवाले
पक्षी ओर भ्रमररूपी बाण जिसमें संचार कर रहे हैं ऐसा यह फूला हुआ पलाश का वृक्ष रुधिर से लथपथ
वीर के तुल्य मालुम पड़ता है