Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 121, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 121, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 121 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
आसिद्धगम्यमध्वानं पश्येम वपुषा वयम् ।
तदन्ते मनसैवाथ दृश्यं पश्येम भो प्रभो ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सुवर्णमय शिखररूप आसन पर वैठनेवाला
अतएव अग्नि में स्थित होनेवाला वायुरूप व्याधि से युक्त ओर-छोरवाला यह मेच बिजली से पीले
आकाश को क्षुब्ध करता है वैसे ही सुवर्णमय शिखरों के तुल्य आसन पर वैठनेवाले, सर्वश्रेष्ठ, वात
व्याधि से (उद्धव से) युक्त सन्निधिवाले उत्कृष्ट एेश्व्यसम्पन्न हरि चमचमा रहे बिजली के सदृश
पीताम्बर को धारण करते हैं यों हरि और मेघ की समानता है