Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 121, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 121, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 121 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
यावत्संवेदनं यावत्संभवं यावदात्मकम् ।
पश्येम इति नो देव दीयतामुत्तमो वरः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
ये ऊँचे बंस उन्नत कुल
के समान हैं । उन्नत कुल के लोग पर्णो से (वाहनों से -रथ, हाथी, घोडे, आदि से) विभूषित होते
हैं तो ये पर्णो से (पत्तों से) विभूषित हँ । उन्नत कुलो का संघ दुरभद्य होता है तो उनका भी संघ दुर्भद्य
है, उन्नत कुल के जन सच्रनों के उपकार के लिए राजा ओं का आश्रय स्वीकार करते हैं, तो इन्होंने
उत्तम छायाओं से पर्वतो को आच्छादित कर रक्खा है । उन्नत कुल के जन सन्मान आदि महान्
गुणों के योग्य होते हैं, तो ये (बाँस) धनुषअवस्था में प्रत्यंचारूप गुणों के योग्य हैँ । यों इन बाँसों की
उन्नत कुलो के साथ पूर्णरूपेण समता है