Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 121, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 121, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 121 · श्लोक 22
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हिन्दी अर्थ
रत्न और मणियों की खानों में लहरें बार-
बार परिवर्तना द्वारा वैसे ही क्रीडा करती हे जैसे कि हाव-भाववाली युवतिर्योँ अपने विलासी पतियों
के वक्षस्थलं पर बार-बार परिवर्तना से क्रीडा करती है